मनोज भावुक Manoj Bhawuk

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An article courtsey purvanchalexpress.com May 24, 2009

manojbhawuk @ 7:16 pm
 भोजपुरी रतन मनोज भावुक

कुछ लोग के इ भरम बा कि मनोज भावुक के प्रसिद्धि सिर्फ इंटरनेट के चलते बा। बाकिर ओह सतही ज्ञान वाला लोग के इ नइखे मालूम कि नेट पर भोजपुरी के अइला मात्र 4-5 साल होता़, जबकि मनोज भावुक नेट पर भोजपुरी के आवे के बहुत पहिले भोजपुरी के एगो स्थापित साहित्यकार बन चुकल रहलें। पीछला डेढ दशक में भोजपुरी के कवनो अइसन पत्र-पत्रिका ना होई जवना मे भावुक के रचना ना छपल होई। साहित्य के हरेक विधा मे स्तरीय आ सारगभित रचना करे वाला, साथ ही फ़िल्म अउर थियेटर पर भी लगातार कलम चलावे वाला आ देश-विदेश में भोजपुरी के प्रचार-प्रसार करे वाला एह युवा साहित्यकार के पहिला किताब’ तस्वीर जिंदगी के’ (ग़ज़ल-संग्रह) 2004 में प्रकाशित हो चुकल रहे, जवना के 2006 में राष्ट्रीय पुरस्कार (भारतीय भाषा परिषद सम्मान) से नवाजल गइल। ई पुरस्कार पहिला बार कवनो भोजपुरी साहित्यकार के मिलल रहे। अंजोरिया डाट काम पर ई किताब छपल त अंजोरिया पर सांचो अंजोर हो गइल। एगो वेबसाइट वाला एह किताब के छापे खातिर झगडा कइलें त कई गो वेबसाइट पर इ किताब साभार छपल। एह तरह से इंटरनेट पर छपे वाली इ भोजपुरी के पहिलकी किताब रहे। बाद में भावुक जी के व्यक्तिगत वेबसाइट (www.manojbhawuk.com) पर भी इ सब सामग्री आ गइल।

बाकिर भावुक  के प्रसिद्धि खाली नेट के चलते नइखे। उनका में फल-फूल बा त जड भी बा आ उहो बहुत गहरा। श्री भावुक भोजपुरी के लगभग सब संस्था विश्व भोजपुरी सम्मेलन ( राष्ट्रीय अध्यक्ष, ग्रेट ब्रिटेन), अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन (प्रबंध मंत्री), पश्चिम बंग भोजपुरी परिषद, भोजपुरी समाज, पूर्वांचल एकता मंच आ भोजपुरी अकादमी आदि से कवनो ना कवना रुप में जुडल रहल बाडन।

आज से 12 साल पहिले भोजपुरी अकादमी जइसन स्तरीय पत्रिका में भावुक के लमहर शोध पत्र ‘ भोजपुरी नाटक के संसार’ छप चुकल बा, सम्मेलन पत्रिका समेत भोजपुरी के तमाम पत्र-पत्रिकन आ राष्ट्रीय स्तर के अखबारन में भावुक भोजपुरी के कालम लिख चुकल बाडन।

अउर सबसे महत्वपूर्ण बात इ कि भावुक विश्व भोजपुरी सम्मेलन जइसन मंच पर संयोजन आ संचालन कर चुकल बाडन आ अब तक दर्जनों राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय मंच पर काव्य-पाठ, आलेख पाठ आ मंच- संचालन आदि के दायित्व निभा चुकल बाडन। – -

अउर आज एगो भोजपुरी टी वी चैनल (हमार टी वी) में प्रोग्रामिग हेड बाडन। – - – - अब एकरा बादो केहू इ कहे कि मनोज भावुक के प्रसिद्धि सिर्फ वेबसाइट के चलते बा त ओकरा के गलदोदई ना त अउर का कहल जाई।

अभी हाले में दिल्ली के श्रीराम सेन्टर में मैथिली-भोजपुरी अकादमी का ओर से गणतंत्र दिवस कविता-उत्सव के आयोजन भइल, जवना में भावुक जी के सुने के अवसर मिलल। 

भावुक के पढत त बहुत दिन से रहीं बाकिर सुनलीं पहिला बेर। पूरा के पूरा सभागार सिर्फ एके गो नाम से गूंजत रहे, मनोज भावुक ,मनोज भावुक । भावुक जी सबका दिलोदिमाग पर छा गइनी। एकस्वर में सभकर डिमांड रहे- भावुक, वंस मोर। तब हमरा एहसास भइल कि भावुक जी जेतना बढिया लिखेनी,  ओह से कई गुना बढिया पढेनी। अइसन मंच संचालक आ एंकर जवना कार्यक्रम के छू ली, ओकरा हीट होखहीं के बा, अइसन हमार विश्वास बा।

www.purvanchalexpress.com गर्वान्वित बा कि मनोज भावुक के नाम भोजपुरी हाल आफ़ फ़ेम में चुनल गइल बा। भावुक के व्यक्तित्व आ कृतित्व से गुजरला पर एगो सुखद एहसास होला। रउरा  भी देखी-

* भोजपुरी हॉल ऑफ़ फ़ेम ( भोजपुरी रतन ) *

1- पूरा नाम- मनोज कुमार सिंह

2- पोपुलर नाम- मनोज भावुक

3- जन्म स्थान- कौसड़, सिवान,बिहार

4- जन्म दिन- 2 जनवरी 1976

5- परिचय- भोजपुरी कवि, फिल्म समीक्षक

6- रउरा एतना कम उम्र में एतना कुछ लिखले बानी, भोजपुरी सिनेमा के इतिहास, भोजपुरी नाटक के इतिहास,विश्व पटल पर भोजपुरी, इंटरनेट पर भोजपुरी, भोजपुरी गजल-संग्रह, भोजपुरी गीत-संग्रह, कविता-दोहा संग्रह आ नाटक आदि । – - – - जे खाली राउर नाम सुनले बा, उ इहे बुझेला कि भावुक कवनो 50-60 के उमिर के वरिष्ठ साहित्यकार के नाम ह बाकिर रउरा त 30-32 के उम्र में ही इ सब कुछ लिख गइनी । कइसे संभव भइल?
– जब से कलम धइनी भोजपुरिये में लिखल शुरु कइनी आ जीवन के अन्तिम सांस ले भोजपुरी में लिखात रही। थियेटर से जुडलीं त भोजपुरिये नाटक के मंचन कइल आ करावल शुरु कइनी। हिन्दी-उर्दू के प्रोजेक्ट तक के भोजपुरी में बदल देनी। पटना में भोजपुरी नाटय महोत्सव शुरु हो गइल। रेडिओ-दूरदर्शन से जुडलीं त भोजपुरिये में प्रोग्राम देबे जाईं। हमार पहिलका सिरियल जवना में अभिनय कइलीं, “सांची पिरितिया’( जवन कि कवनो टी वी चैनल पर भोजपुरी के भी पहिला धारावाहिक रहे) भोजपुरिये रहे। मुंबई गइलीं आ फ़िल्म से जुडलीं त भोजपुरिये फ़िल्म के इतिहास लिखल शुरु कइलीं।

विदेश में जहां भी गइलीं भोजपुरी के संस्था बनवलीं आ भोजपुरिये के आयोजन कइलीं। ग्रेट ब्रिटेन में यूके हिन्दी समिति, बी बी सी लंदन आ गीतांजली बहुभाषीय समुदाय बर्मिंघम के कार्यक्रम में भोजपुरिये के प्रतिनिधि के रुप में शिरकत करीं आ आजो भोजपुरिये के चैनल ‘ हमार टी वी ‘ में सेवा दे रहल बानी। – - – त भोजपुरी त हमरा मन-प्रान में बसल बा आ इ अन्तिम सांस ले साथे रही।- – - – बल्कि हम त भगवान से इहे प्रार्थना करब कि उ अगिलो जनम में हमरा के भोजपुरिये भाषी बनावस ।

7-भोजपुरी भाषा,भोजपुरी मीडिया आ भोजपुरी साहित्य के वर्तमान हालत पर कुछ कही।
— भोजपुरी एगो अन्तरराष्ट्रीय भाषा ह। अपना देश के बाहर भी इ लभभग 14 गो देश मे बोलल जाला। मारिशस,फीजी,गुयाना,सुरीनाम, ट्रीनीडाड आ टाàबैगो ,हालैण्ड आदि देशन मे गिरमिटीया बन के गइल मजदूर अब उहां के गवर्मेंट बन गइल बाड़न । एकरा बावजूद सच्चाई इ बा कि हरेक देश के नया पीढी मे भोजपुरी के प्रति ललक, रुझान आ अपनापन कम बा। गीत-संगीत मे भोजपुरी जिन्दा बा लेकिन  उहो अपना द्विअर्थी आ विकृत स्वरूप मे। भोजपुरी के असली तस्वीर उभरल अभी बाकी बा। भोजपुरी चैनल के अइला से उम्मीद जागल बा। भोजपुरी साहित्य के वर्तमान स्थिति बहुत अच्छा नइखे। जहां एक ओर भोजपुरी के लोकप्रियता आ डिमांड के आलम इ बा कि इग्नो समेत देश के कई गो विश्वविद्यालय  मे एकर पठन-पाठन चालू बा उहवें दूसरा ओर भोजपुरी मे मौलिक आ स्तरीय रचना करे वाला नया साहित्यकारन के संख्या अंगुरी पर गिने लायक बा। भोजपुरी के कवनो अधिवेशन मे देखीं, उहां काला बाल बहुत कमे दिखी। हं लउण्डा नाच होखे त उहां कमर लचकावे वाला भोजपुरिया जवान लोग के कमी नइखे।

8- भोजपुरी से कब आ कइसे लगाव भइल ? लेखन के शुरुआत कइसे भइल?
- बछरु के गाय से कब लगाव होला। भोजपुरी हमार मातृभाषा ह। जाहिर बा माई के गोदिये में एह भाषा के शब्द-शब्द कान में परल होई आ हमरा मुंह से पहिला शब्द एही भाषा में निकलल होई। त भोजपुरी से लगाव त बचपने से बा। जहां तक भोजपुरी मे लेखन के सवाल बा त हमार पहिला भोजपुरी रचना ‘ माई’ 1994 में लिखाइल आ 1996 में इ अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के मासिक मुख पत्र ‘ भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका’ के जून अंक मे छपल। तब से लेके आज ले भोजपुरी मे सृजन जारी बा आ जीवन के अंतिम क्षण तक जारी रही। देश बदलल, परिवेश बदलल – - – माने भारत से अफ्रीका
आ अफ्रीका से लंदन गइनी बाकिर लेखन भोजपुरी में ही आ भोजपुरी खातिर ही होत रहल, हिन्दी आ अंग्रेजी के पत्र-पत्रिकन में भी।

9- भोजपुरी बोले आ सीखे के सबसे अच्छा उपाय?
कवनो भाषा के सिखे आ बोले के सबसे बढिया उपाय होला- ओह माहौल मे रहल। ओह भाषा मे अधिक से अधिक बोलल-लिखल आ पढल। स्तरीय फिल्म देखल आ गाना सुनल।

10- अपना बचपन के बारे में कुछ बताईं?
- बचपन के हमरा याद के दरपन कहां गइल/
माई रे अपना घर के ऊ आंगन कहां गइल

घर के आंगन,  जवना में बचपन के याद के अक्स उभरेला, ओकरा के याद कइला पर अभियो आंख नम हो जाला। आंगन के सुख हमरा बेटा के सुलभ नइखे। उ त शहर के किराया के दू गो बंद कमरा मे बाडन। आंगन जवना मá घर के सब दरवाजा खुलत रहे आ चाची, दादी, भउजी आ बुआ के महफिल जमत रहे , रात भर कथा-कहानी सुने के मिलत रहे, उ सब लोक कथा – सीत-बसंत, कउआ-हंकनी, खूंटा मे मोर दाल बा, का खाई,का पीहीं, का ले परदेश जाईं, सोरठी-वृजाभार, सारंगा, आल्हा, सती-विहुला आदि के कुछ -कुछ कडी राग-धुन समेत आजो हमरा याद बा – - – धीरे से, चुपके से लाठी आ टार्च लेके भाग के जाके नाच देखे आ विहान भइला ओकरा खातिर गोधन कुटाये आ रसभरल गारी सुने के बाललीला अब त खाली याद बन के रह गइल बा।

गरमी के छुट्टी मे बगइचे-बगइचे ढेला आ झटहा चला के आम तूरल, खेत से अलुआ चोरा के जाडा के रात मे कउर (अलाव) मे पका के खाइल आ दियरा मे सबका कोल्हुआरी जा-जाके ऊंख आ महिया खाइल शहर मे त सपने जइसन बा।

11- अपना अब तक के जीवन-सफर के बारे मे कुछ बताई।
- सिवान जिला के कौंसड़ गांव मे एगो क्षत्रिय परिवार मे जनम भइल। हाई स्कूल पास करते आपन पहिला किताब लिखनी- अपना गांव के बायोग्राफी- कौंसड़ का दर्पण” । बाबूजी श्री रामदेव सिंह HINDALCO, RENUKOOT  मे काम करत रहीं। त स्कूल ओही जी से भइल। ओही जी से  रामलीला-नाटक शुरु भइल जवन बाद मे पटना गइला पर बिहार आर्ट थियेटर,कालिदास रंगालय के ओर खींच के ले गइल आ उहां नाट्य डिप्लोमा मे टाप कइनी। पटना मे ही रेडियो-दूरदर्शन से जुड़नी आ कई गो सिरियल मे काम कइनी। भोजपुरी धारावाहिक ”तहरे से घर बसाएब”मे कथा, पटकथा, संवाद-गीत लिखनी। भोजपुरी नाटक आ सिनेमा पर शोध-पत्र लिखनी। 

बाद मे बतौर इंजिनियर पर्ल पेट, मुंबई मे ज्वाइन कइनी आ उहां से अफ्रिका आ लंदन चल गइनी। वर्तमान मे भोजपुरी चैनल हमार टी वी मे बतौर प्रोग्राम प्रोड्यूसर सेवा दे रहल बानी। – त इहे बा हमरा सफर के कहानी जेमे एह जिनिगी के टेढ-मेढ रास्ता पर हम कई बार संभल-संभल के फिसल गइनी त कई बार फिसल-फिसल के संभल गइनी आ जवन खट्टा-मीठा अनुभव भइल उ गजल-गीत-कविता-कहानी – दोहा बन गइल।

12- कुछ लोग भोजपुरी के गंवारू आ पिछडल भाषा बुझेला?
- अगर कवनो आदमी गाय के देख के ई कहे कि ई गाय नंगा बिया त ओह आदमी के बारे में रउरा का कहब ? – - – - – उ त खुदे अपना नंगापन के परिचय देता । कवनो भाषा गंवारू आ पिछडल ना होखे। हं ,इ सांच बा कि कवनो भी भाषा के विकास एह बात पर निर्भर करेला कि ओह भाषा के बोले वाला लोग के आर्थिक, सामाजिक आ राजनैतिक स्थिति केतना मजबूत बा।

13- राउर फेवरेट फिल्मी गाना?
लागी नाही छूटे राम, चाहे जिया जाये

14- सबसे फेवरेट भोजपुरी शब्द? आ मुहावरा ?
एथी आ ए मर्दे
देशी मुर्गी, बेलायती बोल

15- सबसे फेवरेट भोजपुरी खाना?
- लिट्टी-चोखा (दही चाहे मुर्गा के साथे)

16- कवनो अइसन घटना बताईं जवना के वजह से लाइफ मे टनिग भइल।
- अभी ओह घटना के इंतजार बा। अइसे हमरा गजल-संग्रह ” तस्वीर जिन्दगी के ”पर गीतकार गुलजार आ ठुमरी सम्राज्ञी गिरिजा देवी के हाथे भारतीय भाषा परिषद अवार्ड मिलल रोमांचक रहे। अइसे हमरा वेबसाइट WWW.MANOJBHAWUK.COM पर हमरा रचनन खातिर जवन प्रशंसा-पत्र, उद्गार आ नेह ढरकेला उ कवनो अवार्ड से कम नइखे। तब हमरा बुझाला कि हम चलनी मे पानी नइखी भरले कुछ सार्थक कामो कइले बानी।

17- राउर फ्यूचर प्लान?
- अभी त ” हमार टी वी ” के लांचिंग के तइयारी मे बानी। भोजपुरी फ़िल्म-निर्माण खातिर कई गो स्क्रिप्ट (स्क्रीन प्ले, संवाद आ गीत समेत) रेडी बा। हम ओह दिन के इंतजार मे बानी जब भोजपुरी फ़िल्म के आस्कर अवार्ड मिली।

18- भोजपुरिया समाज के सफल होखे खातिर का करे के चाहीं?
-भोजपुरिया भइला पर गर्व करे के चाहीं आ आपुसे मे ना लड़ के एकजुट होके भोजपुरी खातिर लड़े के चाहीं।

19- युवा वर्ग खातिर कवनो संदेश?
- अभी ओह लायक नइखीं। काश, भगवान हमरा के ओह लायक बनावस।

20- तबो रउरा अपना अंदाज में भोजपुरियन के कुछ मैसेज दीं।
- भोजपुरियन के पहचान ‘लाठी’ से होला। लाठी के मतलब लाठी चलवला से नइखे। लाठी के मतलब बा ओकरा कर्मठता, जीजीविषा आ आत्मविश्वास से आ एही के बल पर देश त देश विदेशो में गिरमिटिया बन के गइल भोजपुरिया मजदूर उहां के गवर्नमेंट बन गइलें।विकट से विकट स्थिति में भी ई कर्मठता आ कंफिडेंस बनल रहे के चाहीं – - – -

आ चलते-चलते – हमरा विश्वास बाटे कि हम एक दिन/ अपना सपना के साकार करबे करब -

लाख घेरो घटा आ कुहासा मगर / बनके सूरज कबो त निकलबे करब
ई अलग बात बा आज ले सीप में / हमरा हर बेर भावुक हो बालू मिलल
पर इहे सोच के अभियो डूबल हईं / एक दिन हम त मोती निकलबे करब

21- भोजपुरी हाल आफ़ फ़ेम मे राउर नाम चुनल गइल बा। कइसन लागता?
- स्नेह खातिर आभारी बानी। लेकिन सांच पूछीं त हम भोजपुरी साहित्य के दरियाव मे एगो बूंद भर बानी। साहित्य के रेत के समुन्दर मे के एगो बालू के कण। बस।

:- कुलदीप श्रीवास्तवा

 

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